Sunday, February 9, 2020

उपहार

आज सुबह से नव्या के पैर जमीन पर नहीं पड़ रहे थे। कभी रसोई में जाकर देख कर आती क्या-क्या पकवान बन रहे हैं। कभी बैठक में आकर देखती की घर की सजावट कैसी चल रही है। नव्या की मम्मी सुबह सुबह काजल आंटी को सब समझा कर गई थी।  नव्या को रसोई में बार-बार झाँकते देखकर काजल बोली "क्या हुआ बेबी", क्या चाहिए? कुछ नहीं, आंटी मेरी पसंद का खाना बना रही है। 
"हां बेबी आज तो खास दिन है, आपका जन्मदिन बेबी, आज मेरी बेटी खुशबू का भी जन्मदिन है"। काजल ने अभी कुछमहीने पहले से ही नव्या के घर काम करना शुरू किया था।  नव्या के माता पिता दोनों मल्टीनेशनल कंपनी में अधिकारी थे। 


काजल आंटी सुबह सात बजे से लेकर नव्या के मम्मी या पापा के आने तक उसके घर पर रहती थी। कभी-कभी तो नव्या अपने मम्मी पापा का इंतजार करते-करते सो जाती थी। आज भी तो संडे था पर अब तक तो वह  सोकर उठी मम्मी पापा ऑफिस जा चुके थे।  नव्या की मम्मी ने फोन करके बर्थडे विश किया और उसे गिफ्ट के लिए पूछा।
"मम्मी हमारी वैल्यू एजुकेशन की मैडम ने कहा था कि सबसे अच्छा गिफ्ट होता है दूसरों को खुश रखना।  आज काजल आंटी की बेटी का भी खुशबू काफी बर्थडे है।  मैं खुशबू को अच्छा सा गिफ्ट देना चाहती हूँ"। ठीक है खुशबू को फोन करके पूछो कि उसे क्या गिफ्ट चाहिए और तुम्हे क्या गिफ्ट चाहिए यह भी बता देना। मैं ऑफिस से आते समय गिफ्ट लेती आऊंगी"।  


काजल से उसके घर का नंबर लेकर नव्या ने खुशबू को फोन किया, "हेलो खुशबू हैप्पी बर्थडे मैं नव्या बोल रही हूं"।  "हेलो नव्या तुम्हें भी जन्मदिन की शुभकामनाएं।  मां ने बताया था कि आज तुम्हारा भी जन्मदिन है"।  नव्या ने कहा, धन्यवाद! खुशबू मैं तुम्हारे लिए गिफ्ट लेना चाहती हूं।  बताओ तुम्हें क्या गिफ्ट चाहिए ? खुशबू ने कहा "नव्या अगर तुम मुझे गिफ्ट देना चाहती हो तो क्या तुम मेरी मम्मी को आज जल्दी घर भेज सकती हो?" 


नव्या थोड़ी देर चुप रही फिर उसने कहा, "ठीक है खुशबू, आज काजल आंटी जल्दी घर चली जाएगी। बाय। नव्या ने अपनी  मम्मी को फ़ोन लगाया। नव्या की मम्मी ने पूछा, "हाँ , नव्या  बताओ आप दोनों को क्या गिफ्ट चाहिए? "


नव्या ने कहा , "मम्मी, मुझे और खुशबू को एक ही गिफ्ट चाहिए। " नव्या की मम्मी ने आश्चर्य  से पूछा ऐसी  क्या चीज़ चाहिए। 


"मम्मी , आज हमारे बर्थडे वाले दिन  हमें अपनी मम्मी चाहिए। क्या आज आप ऑफिस से जल्दी आ जाएगी और काजल आंटी को भी जल्दी छुट्टी दे देगी जिससे वह भी अपनी बेटी के साथ उसका बर्थडे सेलब्रटे कर सके। " नव्या की मम्मी ने भरी हुई आवाज से कहा, "हां बेटा, खुशबू और आपको बर्थडे गिफ्ट मिल जायेगा। मैं अभी ऑफिस से निकालती हूँ। "

आभार : सोम सुर, राजस्थान पत्रिका 

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Saturday, May 4, 2019

बालक का त्याग

बालक का त्याग 


एक क्षेत्र में लगातार 12 वर्षों तक वर्षा नहीं हुई | चारों और दुर्भिक्ष आया था | सारे नदी नाले सूख गए| वहां के लोगों के पास इतने साधन नहीं थे कि बड़े यज्ञ कर सके | एक ऋषि ने लोगों से कहा - "भूख से पीड़ित क्षेत्र में लोगों के लिए नरमेध यज्ञ करना होगा, इसके लिए एक व्यक्ति की बलि की आवश्यकता है "| यह सुनते ही चारों ओर नीरवता छा गई | बली के लिए आगे कौन आता | उन सबको यूँ शांत देखकर शांत देखकर महात्मा ने 
कहा - "क्या आप सब में से किसी में भी इतना साहस नहीं कि स्वयं को प्रस्तुत कर सके"|



इतने में एक बालक की आवाज आई, "महर्षि मैं अपना बलिदान देने के लिए सहर्ष प्रस्तुत हूं" । उस बालक का नाम शतमन्यु था, और वह अपने माता पिता की इकलौती संतान था । उसने ऋषिवर से कहा "महात्मा आप यज्ञ आरंभ करें, मैं अपने माता पिता की आज्ञा लेकर अभी आता हूं | इसके बाद वह अपने घर पहुंचा और माता पिता को अपने फैसले की जानकारी दी | माता पिता भी उसके तर्क के समक्ष ना नहीं कह सके | इसके बाद वह लौटकर पुनः यज्ञ स्थल पर आ गया । 

बली का समय आया बालक निर्भीक भाव से शावक के समान  अपना मस्तक ऊंचा किए हुए बलिवेदी पर जाकर खड़ा हो गया । यज्ञाचार्य ने  बालक सेे कहा आप सबका अंतिम अभिवादन कर लो। ज्योही  पुरोहित ने हाथ में खडक लिया कि आकाश मंडल का वातावरण बदल गया। देव लोक से पुष्प वर्षा होने लगी। साधु साधु के स्वर उठने लगे। पुष्पों की वर्षा के बीच इंद्रदेव वहां प्रकट हुए और बालक के गले में पुष्प माला डालकर सभी उपस्थित लोगों को संबोधित कर कहा- "मैं इस बालक की त्यागवृृृत्ति से प्रसन्न हूं । अब यहां  मेघ बरसेेंगे । आलस, असंयम, अनैतिकता में डूबे आप सभी लोगों को सचेत करने के लिए दंड दिया गया था। लेकिन जहां ऐसे परमार्थी हो वहां कोई दैवीय आपदा नहीं टिक सकती।"

Thursday, March 14, 2019

स्वाभिमानी बालक

स्वाभिमानी बालक


धन के अभाव से मनुष्य बहुत विचलित हो जाता है और अनुचित कार्य करने को भी तैयार हो जाता है। परंतु अपवाद भी हैं। एक अल्पायु बालक गांव के अन्य बच्चों के साथ गंगा के उस पार मेला देखने गया। शाम को वापस आते समय जब सभी साथी गंगा किनारे पहुंचे तो बालक लाल बहादुर ने गांव के किराय के लिए जेब में हाथ डाला, परंतु वहां एक पैसा भी नहीं था। बालक वहीं रुक गया। उसने अपने साथियों से कहा कि वह और कुछ देर तक मेला देखना चाहता है। लालबहादुर नहीं चाहता था कि साथियों के समक्ष वह दीन बने। उसका स्वाभिमान उधार लेने की अनुमति भी नहीं देता था। 
जब बालक ने देखा कि उसके साथी पार जा चुके हैं तो उसने कपड़े उतारे और उनको सिर पर लपेट लिया। उस समय गंगा में बाढ़ आई थी। बड़े से बड़ा तैराक भी आधा मील चौड़ा पाठ पार करने का साहस नहीं कर सकता था। पास खड़े मल्लाह ओं ने भी उसे रोकने की कोशिश की। 

परंतु बालक लाल बहादुर में एक ना सुनी और खतरों की तनिक भी परवाह न कर यह स्वाभिमानी बालक गंगा में कूद पड़ा भाव काफी तेज था। पानी भी गहरा था और मल्लाहों ने भी उसे नाव पकड़ लेने का अनुरोध किया। परंतु वह बालक तैयार कर थोड़ी ही देर बाद नदी के दूसरे किनारे पहुंच गया। यही स्वाभिमानी बालक लालबहादुर शास्त्री के नाम से प्रख्यात हुआ।

Wednesday, March 13, 2019

हंसते हुए मृत्यु का आलिंगन

हंसते हुए मृत्यु का  आलिंगन

यूनान के महान दार्शनिक महात्मा सुकरात ने वहां के नवयुवकों में नवीन जागृति पैदा की और पाखंड तथा अंधविश्वास के विरुद्ध लड़ने की प्रेरणा दी। शीघ्र ही वह नव युवकों में लोकप्रिय हो गए।

 एथेंस के ज्ञानी और प्रमादी सत्ता धारियों को यह अच्छा नहीं लगा, उन्होंने अनेक मिथ्या आरोप लगाकर उन पर मुकदमा चलाया। सुकरात के शुचिंतकों ने उन्हें राज्य से बाहर जाने की सलाह दी। सुकरात ने उत्तर दिया, "अपने प्राण बचाने के लिए मैं युवकों के सामने बुरा उदाहरण नहीं रखूंगा"। वे निर्भय होकर न्यायालय में उपस्थित हुए। 

वहां अभियोग पढ़कर उन्हें सुनाए गए और उन अपराधों को स्वीकार कर क्षमा मांगने के लिए कहा गया। सुकरात ने अन्याय के सामने सिर झुकाने से इंकार कर दिया और कहा, "मेरी चिंता तो उन्हें करनी चाहिए जिन्हें मेरे ना रहने से हानि होगी, मेरा जीवन तो दूसरों के लिए है"। 

उन्हें दंड सुना दिया गया। उनके मित्रों ने फिर उन्हें बंदी ग्रह से निकल भागने की सलाह दी, परंतु सुकरात ने जनता के सामने ऐसा गलत उदाहरण रखना पसंद नहीं किया और अविचल रहकर मृत्यु की प्रतीक्षा करते रहे।

अंतिम क्षणों तक उनमें कोई घबराहट नहीं थी वे अत्यंत सहज भाव से बातें कर रहे थे। 

मृत्युदंड के लिए उन्हें विष का प्याला दिया गया। विष पी लेने के बाद भी उनके मुख पर भय अथवा विषाद की रेखा नहीं थी। वह धैर्य एवं शांति का उपदेश देते रहे। अंतिम क्षण तक तनिक भी दुर्बलता उन में नहीं देखी गई। 

मरने के बाद भी उस महात्मा के मुख पर सुख और संतोष की छाप थी। उन्होंने हंसते-हंसते विदा ली परंतु सारा यूनान उनकी मृत्यु पर रो रहा था।

Friday, February 15, 2019

सब जग जलता देखिए :अपनी अपनी आग

कहानी जो सिखाती है - "मृत्यु एक सत्य है"



सब जग जलता देखिए : अपनी अपनी आग


महात्मा गौतम बुद्ध की ख्याति जब चारों ओर फैल गई तो उनके पास सभी तरह के लोग आने लगे। वह बुद्ध से अपने कष्टों का निदान पूछते।  लोग उन्हें साक्षात देवदूत मानते थे और यह आशा करते थे कि वह संभव को भी असंभव कर डालेंगे। 

एक दिन एक स्त्री, फिसा गौतमी रोती हुई उनके पास पहुंची। उसका इकलौता बेटा मर गया था।  शोक  से व्याकुल होकर गौतमी चरणों में गिर पड़ी और कहने लगी, "भगवान, किसी तरह किसी मंत्र से मेरे बेटे को जिंदा कर दो।" 

गौतम बुद्ध कुछ क्षणों तक सोचते रहे।  फिर करुण स्वर से बोले, "शोक ना करो,  हम तुम्हारे बच्चे को जीवित कर देंगे।  परंतु इसके लिए तुम किसी ऐसे घर से सरसों के थोड़े से दाने मांग कर लाओ जहां कभी किसी की मृत्यु ना हुई हो।" 

गौतमी की जान में जान आई वह गांव की ओर दौड़ पड़ी।  दिन भर भटकती रही। कई गांव में गई, परंतु उसे एक भी ऐसा घर नहीं मिला जहां किसी की कभी मृत्यु ना हुई हो। 

हताश होकर वह लौट आई।  

गौतम बुद्ध ने समझाया मृत्यु कोई अनहोनी घटना नहीं है।  ऐसी विपत्ति एक ना एक दिन सभी पर आती है।  उसे धैर्य पूर्वक सहन करना पड़ता है।  

इस अटल सत्य को समझ कर गौतमी की व्यथा कम हो गई। 

Saturday, February 9, 2019

वीरता का सम्मान

 वीरता का सम्मान

झेलम नदी के
किनारे ईसा से पूर्व एक राजा था पुरु, जिस की वीरता की गाथाएं इतिहास में अमर है। यूनान का पराक्रमी राजा सिकंदर अनेक देशों को रौंदता हुआ भारत पर टूट पड़ा। अनेक छोटे छोटे राजाओं ने सिकंदर की अधीनता स्वीकार कर ली, परंतु स्वाधीनता प्रेमी राजा पुरु ने साफ इनकार कर दिया।

राजा पुरु ने बड़े साहस और वीरता से सिकंदर का मुकाबला किया। परंतु यूनानी युद्ध कौशल तथा आधुनिक शास्त्रों के आगे उसकी सेना के पांव उखड़ गए और वह स्वयं घायल हो गया।

पुरु की वीरता से सिकंदर बड़ा प्रसन्न हुआ और उसने मैरोस के हाथ युद्ध बंद करने का संदेश भेजा।

पुरु में शांति प्रस्ताव मान लिया और हाथी से उतरकर बिना हथियारों के सिकंदर से मिलने के लिए आगे बढ़ा।

सिकंदर  भी शूरवीर तथा पराक्रमी राजा के सम्मान स्वरूप दो कदम आगे बढ़ा और पूछा "महाराज पुरु, आप के साथ कैसा व्यवहार किया जाए"।

राजा पुरु के मुख पर तनिक भी भय या तनाव नहीं था निराशा या आशंका भी नहीं थी। पराजय तथा सर्वनाश भी उसको नहीं झुका सका, उसने निर्भीकता से उत्तर दिया "जैसा एक राजा दूसरे राजा के साथ करता है"।

पराजय के उन क्षणों में कुछ शूरवीर की निर्भीकता एवं आत्मगौरव से सिकंदर बहुत प्रभावित हुआ। वह वीरों का सम्मान करना जानता था, उसने पुरु का राज्य तो उसे लौटा ही दिया साथ में अपने जीते हुए और प्रदेश उसे सौंप दिए और उसे अपना मित्र बना लिया।

Thursday, February 7, 2019

दुष्टता की पराजय

दुष्टता की पराजय


बहुत दिन की बात है। दक्षिण की एक  नगर में एक संत पुरुष रहते थे जो गृहस्थ थे, और व्यवसाय भी करते थे परंतु क्रोध और लोभ से दूर रहते थे उनका नाम तिरुवल्लुवर था।

उसी नगर में एक धनी व्यापारी का पुत्र देवदत्त भी था जो बड़ा दुष्ट तथा क्रोधी  था।

एक दिन किसी व्यक्ति ने तिरुवल्लुवर के आत्म संयम की प्रशंसा की तो देवदत्त में अहंकार पूर्ण स्वर में घोषणा की वह उन्हें भी उत्तेजित और  क्रूध कर सकता है।

और एक दिन तिरुवल्लुवर हाथ के बने कपड़े बेच रहे थे तो देवदत्त उनके पास जा पहुंचा। उसने एक चादर हाथ में लेकर उसके दाम पूछे।

दो रुपये सुनकर देवदत्त ने चादर के दो टुकड़े कर दिए और आधी चादर के दाम पूछे।

संत तिरुवल्लुवर ने कहा, "एक रुपया"।

देवदत्त ने फिर कपड़ा फाड़ दिया और दाम पूछे। इस प्रकार आठ टुकड़े कर के एक टुकड़े का दाम पूछा।

"चार आने", संत ने सहज  स्वर  से  कहा।

उनका अथाह संयम देखकर देवदत्त की समझ में नहीं आया कि अब क्या करें । पर वह भी पक्का हटी था । बोला, "इन टुकड़ों का मैं क्या करूंगा? यह बेकार है।"

संत बोले, "आप सच कहते हैं।"

परंतु देवदत्त ने फिर दूसरा दाव मारा। बोला, "अच्छा तुम इसके दो रुपए ले लो।"

महात्मा ने विनम्र व शांत स्वर में कहा, "तुम्हारे रुपए स्वीकार करने पर तुम्हारा अहम् बना रहेगा और यह टुकड़े कोई काम नहीं आएंगे। मैं तो इन टुकड़ों को सी लूंगा और स्वयं इसे ओढ़ कर सोया करूंगा। इस प्रकार इसकी उपयोगिता बनी रहेगी और हानि पूर्ति भी हो जाएगी।"

देवदत्त का सारा अहंकार चिथड़े चिथड़े उड़ गया वह संत पुरुष के पैर पकड़कर क्षमा मांगने लगा।

उपहार

आज सुबह से नव्या के पैर जमीन पर नहीं पड़ रहे थे। कभी रसोई में जाकर देख कर आती क्या-क्या पकवान बन रहे हैं। कभी बैठक में आकर देखती की घर की स...