Saturday, February 9, 2019

वीरता का सम्मान

 वीरता का सम्मान

झेलम नदी के
किनारे ईसा से पूर्व एक राजा था पुरु, जिस की वीरता की गाथाएं इतिहास में अमर है। यूनान का पराक्रमी राजा सिकंदर अनेक देशों को रौंदता हुआ भारत पर टूट पड़ा। अनेक छोटे छोटे राजाओं ने सिकंदर की अधीनता स्वीकार कर ली, परंतु स्वाधीनता प्रेमी राजा पुरु ने साफ इनकार कर दिया।

राजा पुरु ने बड़े साहस और वीरता से सिकंदर का मुकाबला किया। परंतु यूनानी युद्ध कौशल तथा आधुनिक शास्त्रों के आगे उसकी सेना के पांव उखड़ गए और वह स्वयं घायल हो गया।

पुरु की वीरता से सिकंदर बड़ा प्रसन्न हुआ और उसने मैरोस के हाथ युद्ध बंद करने का संदेश भेजा।

पुरु में शांति प्रस्ताव मान लिया और हाथी से उतरकर बिना हथियारों के सिकंदर से मिलने के लिए आगे बढ़ा।

सिकंदर  भी शूरवीर तथा पराक्रमी राजा के सम्मान स्वरूप दो कदम आगे बढ़ा और पूछा "महाराज पुरु, आप के साथ कैसा व्यवहार किया जाए"।

राजा पुरु के मुख पर तनिक भी भय या तनाव नहीं था निराशा या आशंका भी नहीं थी। पराजय तथा सर्वनाश भी उसको नहीं झुका सका, उसने निर्भीकता से उत्तर दिया "जैसा एक राजा दूसरे राजा के साथ करता है"।

पराजय के उन क्षणों में कुछ शूरवीर की निर्भीकता एवं आत्मगौरव से सिकंदर बहुत प्रभावित हुआ। वह वीरों का सम्मान करना जानता था, उसने पुरु का राज्य तो उसे लौटा ही दिया साथ में अपने जीते हुए और प्रदेश उसे सौंप दिए और उसे अपना मित्र बना लिया।

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