हंसते हुए मृत्यु का आलिंगन
यूनान के महान दार्शनिक महात्मा सुकरात ने वहां के नवयुवकों में नवीन जागृति पैदा की और पाखंड तथा अंधविश्वास के विरुद्ध लड़ने की प्रेरणा दी। शीघ्र ही वह नव युवकों में लोकप्रिय हो गए।
एथेंस के ज्ञानी और प्रमादी सत्ता धारियों को यह अच्छा नहीं लगा, उन्होंने अनेक मिथ्या आरोप लगाकर उन पर मुकदमा चलाया। सुकरात के शुचिंतकों ने उन्हें राज्य से बाहर जाने की सलाह दी। सुकरात ने उत्तर दिया, "अपने प्राण बचाने के लिए मैं युवकों के सामने बुरा उदाहरण नहीं रखूंगा"। वे निर्भय होकर न्यायालय में उपस्थित हुए।
वहां अभियोग पढ़कर उन्हें सुनाए गए और उन अपराधों को स्वीकार कर क्षमा मांगने के लिए कहा गया। सुकरात ने अन्याय के सामने सिर झुकाने से इंकार कर दिया और कहा, "मेरी चिंता तो उन्हें करनी चाहिए जिन्हें मेरे ना रहने से हानि होगी, मेरा जीवन तो दूसरों के लिए है"।
उन्हें दंड सुना दिया गया। उनके मित्रों ने फिर उन्हें बंदी ग्रह से निकल भागने की सलाह दी, परंतु सुकरात ने जनता के सामने ऐसा गलत उदाहरण रखना पसंद नहीं किया और अविचल रहकर मृत्यु की प्रतीक्षा करते रहे।
अंतिम क्षणों तक उनमें कोई घबराहट नहीं थी वे अत्यंत सहज भाव से बातें कर रहे थे।
मृत्युदंड के लिए उन्हें विष का प्याला दिया गया। विष पी लेने के बाद भी उनके मुख पर भय अथवा विषाद की रेखा नहीं थी। वह धैर्य एवं शांति का उपदेश देते रहे। अंतिम क्षण तक तनिक भी दुर्बलता उन में नहीं देखी गई।
मरने के बाद भी उस महात्मा के मुख पर सुख और संतोष की छाप थी। उन्होंने हंसते-हंसते विदा ली परंतु सारा यूनान उनकी मृत्यु पर रो रहा था।

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