Thursday, March 14, 2019

स्वाभिमानी बालक

स्वाभिमानी बालक


धन के अभाव से मनुष्य बहुत विचलित हो जाता है और अनुचित कार्य करने को भी तैयार हो जाता है। परंतु अपवाद भी हैं। एक अल्पायु बालक गांव के अन्य बच्चों के साथ गंगा के उस पार मेला देखने गया। शाम को वापस आते समय जब सभी साथी गंगा किनारे पहुंचे तो बालक लाल बहादुर ने गांव के किराय के लिए जेब में हाथ डाला, परंतु वहां एक पैसा भी नहीं था। बालक वहीं रुक गया। उसने अपने साथियों से कहा कि वह और कुछ देर तक मेला देखना चाहता है। लालबहादुर नहीं चाहता था कि साथियों के समक्ष वह दीन बने। उसका स्वाभिमान उधार लेने की अनुमति भी नहीं देता था। 
जब बालक ने देखा कि उसके साथी पार जा चुके हैं तो उसने कपड़े उतारे और उनको सिर पर लपेट लिया। उस समय गंगा में बाढ़ आई थी। बड़े से बड़ा तैराक भी आधा मील चौड़ा पाठ पार करने का साहस नहीं कर सकता था। पास खड़े मल्लाह ओं ने भी उसे रोकने की कोशिश की। 

परंतु बालक लाल बहादुर में एक ना सुनी और खतरों की तनिक भी परवाह न कर यह स्वाभिमानी बालक गंगा में कूद पड़ा भाव काफी तेज था। पानी भी गहरा था और मल्लाहों ने भी उसे नाव पकड़ लेने का अनुरोध किया। परंतु वह बालक तैयार कर थोड़ी ही देर बाद नदी के दूसरे किनारे पहुंच गया। यही स्वाभिमानी बालक लालबहादुर शास्त्री के नाम से प्रख्यात हुआ।

Wednesday, March 13, 2019

हंसते हुए मृत्यु का आलिंगन

हंसते हुए मृत्यु का  आलिंगन

यूनान के महान दार्शनिक महात्मा सुकरात ने वहां के नवयुवकों में नवीन जागृति पैदा की और पाखंड तथा अंधविश्वास के विरुद्ध लड़ने की प्रेरणा दी। शीघ्र ही वह नव युवकों में लोकप्रिय हो गए।

 एथेंस के ज्ञानी और प्रमादी सत्ता धारियों को यह अच्छा नहीं लगा, उन्होंने अनेक मिथ्या आरोप लगाकर उन पर मुकदमा चलाया। सुकरात के शुचिंतकों ने उन्हें राज्य से बाहर जाने की सलाह दी। सुकरात ने उत्तर दिया, "अपने प्राण बचाने के लिए मैं युवकों के सामने बुरा उदाहरण नहीं रखूंगा"। वे निर्भय होकर न्यायालय में उपस्थित हुए। 

वहां अभियोग पढ़कर उन्हें सुनाए गए और उन अपराधों को स्वीकार कर क्षमा मांगने के लिए कहा गया। सुकरात ने अन्याय के सामने सिर झुकाने से इंकार कर दिया और कहा, "मेरी चिंता तो उन्हें करनी चाहिए जिन्हें मेरे ना रहने से हानि होगी, मेरा जीवन तो दूसरों के लिए है"। 

उन्हें दंड सुना दिया गया। उनके मित्रों ने फिर उन्हें बंदी ग्रह से निकल भागने की सलाह दी, परंतु सुकरात ने जनता के सामने ऐसा गलत उदाहरण रखना पसंद नहीं किया और अविचल रहकर मृत्यु की प्रतीक्षा करते रहे।

अंतिम क्षणों तक उनमें कोई घबराहट नहीं थी वे अत्यंत सहज भाव से बातें कर रहे थे। 

मृत्युदंड के लिए उन्हें विष का प्याला दिया गया। विष पी लेने के बाद भी उनके मुख पर भय अथवा विषाद की रेखा नहीं थी। वह धैर्य एवं शांति का उपदेश देते रहे। अंतिम क्षण तक तनिक भी दुर्बलता उन में नहीं देखी गई। 

मरने के बाद भी उस महात्मा के मुख पर सुख और संतोष की छाप थी। उन्होंने हंसते-हंसते विदा ली परंतु सारा यूनान उनकी मृत्यु पर रो रहा था।

उपहार

आज सुबह से नव्या के पैर जमीन पर नहीं पड़ रहे थे। कभी रसोई में जाकर देख कर आती क्या-क्या पकवान बन रहे हैं। कभी बैठक में आकर देखती की घर की स...