स्वाभिमानी बालक
धन के अभाव से मनुष्य बहुत विचलित हो जाता है और अनुचित कार्य करने को भी तैयार हो जाता है। परंतु अपवाद भी हैं। एक अल्पायु बालक गांव के अन्य बच्चों के साथ गंगा के उस पार मेला देखने गया। शाम को वापस आते समय जब सभी साथी गंगा किनारे पहुंचे तो बालक लाल बहादुर ने गांव के किराय के लिए जेब में हाथ डाला, परंतु वहां एक पैसा भी नहीं था। बालक वहीं रुक गया। उसने अपने साथियों से कहा कि वह और कुछ देर तक मेला देखना चाहता है। लालबहादुर नहीं चाहता था कि साथियों के समक्ष वह दीन बने। उसका स्वाभिमान उधार लेने की अनुमति भी नहीं देता था।
जब बालक ने देखा कि उसके साथी पार जा चुके हैं तो उसने कपड़े उतारे और उनको सिर पर लपेट लिया। उस समय गंगा में बाढ़ आई थी। बड़े से बड़ा तैराक भी आधा मील चौड़ा पाठ पार करने का साहस नहीं कर सकता था। पास खड़े मल्लाह ओं ने भी उसे रोकने की कोशिश की।
परंतु बालक लाल बहादुर में एक ना सुनी और खतरों की तनिक भी परवाह न कर यह स्वाभिमानी बालक गंगा में कूद पड़ा भाव काफी तेज था। पानी भी गहरा था और मल्लाहों ने भी उसे नाव पकड़ लेने का अनुरोध किया। परंतु वह बालक तैयार कर थोड़ी ही देर बाद नदी के दूसरे किनारे पहुंच गया। यही स्वाभिमानी बालक लालबहादुर शास्त्री के नाम से प्रख्यात हुआ।

