दुष्टता की पराजय
बहुत दिन की बात है। दक्षिण की एक नगर में एक संत पुरुष रहते थे जो गृहस्थ थे, और व्यवसाय भी करते थे परंतु क्रोध और लोभ से दूर रहते थे उनका नाम तिरुवल्लुवर था।
उसी नगर में एक धनी व्यापारी का पुत्र देवदत्त भी था जो बड़ा दुष्ट तथा क्रोधी था।
एक दिन किसी व्यक्ति ने तिरुवल्लुवर के आत्म संयम की प्रशंसा की तो देवदत्त में अहंकार पूर्ण स्वर में घोषणा की वह उन्हें भी उत्तेजित और क्रूध कर सकता है।
और एक दिन तिरुवल्लुवर हाथ के बने कपड़े बेच रहे थे तो देवदत्त उनके पास जा पहुंचा। उसने एक चादर हाथ में लेकर उसके दाम पूछे।
दो रुपये सुनकर देवदत्त ने चादर के दो टुकड़े कर दिए और आधी चादर के दाम पूछे।
संत तिरुवल्लुवर ने कहा, "एक रुपया"।
"चार आने", संत ने सहज स्वर से कहा।
उनका अथाह संयम देखकर देवदत्त की समझ में नहीं आया कि अब क्या करें । पर वह भी पक्का हटी था । बोला, "इन टुकड़ों का मैं क्या करूंगा? यह बेकार है।"
संत बोले, "आप सच कहते हैं।"
परंतु देवदत्त ने फिर दूसरा दाव मारा। बोला, "अच्छा तुम इसके दो रुपए ले लो।"
महात्मा ने विनम्र व शांत स्वर में कहा, "तुम्हारे रुपए स्वीकार करने पर तुम्हारा अहम् बना रहेगा और यह टुकड़े कोई काम नहीं आएंगे। मैं तो इन टुकड़ों को सी लूंगा और स्वयं इसे ओढ़ कर सोया करूंगा। इस प्रकार इसकी उपयोगिता बनी रहेगी और हानि पूर्ति भी हो जाएगी।"
देवदत्त का सारा अहंकार चिथड़े चिथड़े उड़ गया वह संत पुरुष के पैर पकड़कर क्षमा मांगने लगा।
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