अहंकारी शिष्य और गुरु की महानता
मध्यकालीन भारत में बैजू बावरा नाम के एक सिद्ध गायक तथा संगीतचार्या थे। वे एक कुटिय में रह कर जिज्ञासु शिष्यों को संगीत की शिक्षा देते थे।
उन का एक प्रतिभाशाली शिष्य गोपाल नायक जब विदा होने लगा तो गुरु ने कहा, "बेटा गोपाल, मैंने तुम्हे जो अमूल्य निधि सौंपी है उस की रक्षा करना, उस का सदुपयोग करना और उसके द्वारा लोक को सुखी बनाना। "अपनी प्रतिभा तथा संगीत निपूर्णता के कारण गोपाल नायक सीग्रह ही ख्याति के सिखर पर पहुँच गया और दिल्ली दरबार का प्रधान गायक बान गया।
राज दरबार में सम्मान प्राप्त होने पर गोपाल में अहंकात आ गया और वह अन्य गायको को नीचा दिखने लगा। वह उन्हें मुकाबले के लिए मजबूर ललकारता और शर्त रखता कि हरने वाले का सर कटवा दिया जायेगा।
जब सैकड़ो संगीतज्ञयों की विधवा पत्नियों तथा अन्यथा बच्चों का चीत्कार बैजू बावरा तक पहुंचा तो वे विचिलित हो उठे और अपने शिष्य को समझने दिल्ली पहुंचे।
लेकिन मद में चूर गोपाल नायक ने गुरु को पहचनने से भी इंकार कर दिय। और तो और , उसने गुरु भी दूसरे दिन दरबार में प्रतियोगिता के लिए ललकारा।
कुछ सोचकर महान संगीत गुरु बैजू बावरा ने शिष्य की चुनौती स्वीकार कर ली।
अगले दिन गुरु और शिष्य की अनोखी संगीत प्रतियोगिता शुरू हुई। संगीत का ऐसा समां बंध गया कि श्रोतागण मुग्ध हो गए। परन्तु संगीत के लिए समूचा जीवन अर्पित कर देने वाले गुरु को वह अहंकारी शिष्य भला कैसे हरा सकता था। गोपाल नायक हार गया और शर्त के अनुसार वह मृत्यु दंड का पात्र बना।
विजयी बैजू बावरा से जब इच्छानुसार पुरस्कार माँगने को कहा गया तो उस उदार हृदय गुरु ने कहा कि उन के पराजित शिष्य को जीवन दान दिया जाए। इस के अतिरिक्त उन्होंने कुछ भी नहीं माँगा।
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